सूरज की पहली किरण जो कुह लोगो के लिए लाती है| ख़ुशी का पैगाम तो कुछ के लिए दर्द और परेशानी |यही कुदरत का दस्तूर है |पूर्वी उत्तर परदेस का एक शहर नवाब्गढ़ |यही एक मोहल्ला है कुरैशी टोला |यहाँ रहने वाले हारुन अली के लिए अप्रैल की वो सुबह एक मनहूस खबर ले कर आई थी |
दरवाज़े पर होने वाली ज़ोरदार आवाज़ ने जल्दी उठने पर मजबूर कर दिया था |किवाड़ खोलते ही पुलिस एक भद्दी सी गाली देते हुए अन्दर घुस आई | और पूरे घर की तलाशी शुरू कर दी सारा सामान इधर उधर फेंकते हुए पुलिस साले कटुवे... तेरी माँ की... मादर... जैसी गलियां भी बक रहे थे|क़यामत का मंज़र था...सारा मोहल्ला घर के सामने एक भीड़ की शक्ल में जमा हो गया था |ठिठुरती ठण्ड में कांपते हुए गरीब बच्चे की तरह कांप रहा था उनका पूरा बदन| ये सुनकर की उनका बेटा जावेद अली अलकायदा का आतंकी है और पुलिस ने उसे एक मुठभेड़ में पकड़ लिया है |कोहराम मच गया था उनके घर में..|
सुबह की रौशनी फैलते ही टीवी चैनल वाले चीख चीख कर कह रहे थे |
जावेद नाम का आतंकवादी गिरफ्तार |अलकायदा का एरिया कमांडर है जावेद |किसी बड़े बम धमाके की फ़िराक में था ये |मुठभेड़ के बाद लगी सुरछ्छा एजेंसी के हाथो बड़ी सफलता|
जैसे जैसे सूरज आग उगल रहा था वैसे वैसे पत्रकारों के सावल भी हारुन अली को जला रहे थे |सत्तर के साल के बूढ़े हारुन अली ने कभी ख्वाब में नहीं सोचा था की ये दिन भी उनकी ज़िन्दगी में आएगा |सवालों से बौखला कर हाथ जोड़ कर बोले क्यों एक बूढ़े की जान लेने पर तुले हुए हैं आप लोग |रोते हुए बोले या अल्लाह ये क्या हो गया |किस गुनाह की सजा दी है तूने | पूरे शर में एक कुहराम मचा हुआ था ये खबर सुनकर |
अभी परसों ही घर आया था जावेद |छोटी बहन की शादी की तैयारी जो करनी थी उसे |कितना मिलनसार लड़का था वो |पिछले साल ही तो इंजीनियरिंग पास की थी उसने |नहीं नहीं जावेद और आतंकवादी कत्तई नहीं |हर इन्सान की जुबां पर यही बात थी |कोई ये मानने को तैयार ही नहीं था की जावेद आतंकवादी है|पूरे शहर में कुहराम मचा था |हारुन अली के घर पूछिए मत कब्रिस्तान जैसी मुर्दनी छाई हुई थी |न खाने का होश न पीने का |लेकिन कुछ करना तो था ही यु ही हाथ पे हाथ रख के बैठा तो जा नहीं सकता था |हारुन साहब की ढलती उम्र और कमजोरी |उस पर बेटा दहशत गर्द के आरोप में क़ैद|कमर टूट गई थी उनकी |बात काबिले यकीन तो न थी मगर शक के घेरे में तो आ ही गया था उनका घर |रिश्तेदारों ने नाता तोड़ लिया था उनसे |दोस्त भी मुह चुराने लगे थे |क़यामत के दिन थे ये |लेकिन असली क़यामत तो उस दिन टूटो थी जिस बेटी का रिश्ता ये कहकर तोड़ दिया गया की हम एक आतंकवादी के घर शादी नहीं कर सकते |
लगातार दो माह की भाग दौड़ के बाद आज जावेद से मिलने से मिलने का मौक़ा मिल पाया था |पहले तो पहचान ही न पाए थे जावेद को हारून साहब |सुर्ख आँखे लगातार कई रात को जागने की चुगली कर रही थीं |
बदन हड्डियों का ढांचा, चेहरा बेवा की सफ़ेद चादर सा बेरंग |दोनों हाथो में पट्टियां और पैरो पर चढ़े प्लास्टर ने चलने लायक भी न छोड़ा था उसे |व्हीलचेयर पर बैठे २२ साल के जावेद ने अगर अब्बू कहकर न पुकारा होता तो हारुन अली उसे पहचान ही न पाते |बाप बेटे के मिलन का वो मंज़र बस इतना समझ लीजिये ...आंसुओं की तूफानी बारिश थी जो उम्मीद की मुंडेरों को गला देना चाहती थीं |
हारुन अली के साथ भी वही हुआ |जो आम हिन्दुस्तानी के साथ इस देश की हुकूमत और अदालते करती हैं |मुक़दमे चले,पेशियाँ हुईं,तारीखों पर तारीखें मिलती रहीं|वक़्त गुज़रता रहा |इस दौरान क्या कुछ नहीं हुआ हारुन अली की ज़िन्दगी में |ज़मीनें बिकी,मकाम नीलाम हुआ |सारा असबाब मुक़दमे बाज़ी निगल गई |फिर भी एक उम्मीद....|लेकिन एक दिन वो हुआ जिस की उम्मीद किसी ने भी नहीं की थी खुद हारुन अली ने भी नहीं|
बेटे की बेगुनाही का मुक़दमा लड़ते लड़ते खुद अपनी ज़िन्दगी की बाज़ी हार गए हारुन अली |
बाप की मय्यत को कन्धा भी न दे सका जावेद |आखिरी दीदार भी न कर सका उनका | जेल के अँधेरे में दफन हो गई उसकी जवानी |पूरे दस साल क़ैद रहा वो सिर्फ शक की बिना पर |
जावेद अली खान वल्द हारुन अली खान पर लगाए सारे आरोप बेबुनियाद और झूठे हैं लिहाज़ा अदालत जावेद अली को रिहा करती है और जाँच एजेंसियों को ताकीद करती है की भविष्य में ऐसी गलती दुबारा न हो |पूरे शहर में जश्न का mahaol था |मिठाइयाँ बाँट रही कुरैशी टोला में |पूरे शहर को था जावेद का इन्तिज़ार |
आखिर दोपहर तीन बजे घर पहुंचा जावेद ||गले मिलकर मुबारकबाद दे रहे थे लोग उसे|बहुत खुश थे लोग उसे देखकर |मगर जावेद एक जिंदा लाश की मानिंद था |उसका चेहरा किसी बेवा की उजड़ी मांग की तरह बेनूर था |कुछ नहीं था उसके सपाट चेहरे में \अगर कुछ था तो कुछ सवाल जिनका जवाब मिलना नामुमकिन था |
कौन ज़िम्मेदार है मेरी तबाही का ???
मेरे ऊपर हुए ज़ुल्मों का कौन ज़िम्मेदार है???
मेरा घर बर्बाद हो गया कौन ज़िम्मेदार ???
मेरा बाप मेरी रिहाई की उम्मीद लिए हुए मर गया कौन ज़िम्मेदार???
मेरी बहन का रिश्ता टूट गया कौन ज़िम्मेदार ???
मेरे अज़ीयत में गुज़ारे हुए दस सालो का हिसाब कौन देगा???
मेरा भविष्य तबाह हो गया कौन ज़िम्मेदार???
मेरे माथे पे लगे बदनामी के कलंक का कौन ज़िम्मेदार???
सिर्फ शक की बिना पर|क्योंकि मै मुसलमान हूँ |और हर मुसलमान दहशत गर्द होता है |आखिर कब तक होता रहेगा ये |आखिर कब तक |
दरवाज़े पर होने वाली ज़ोरदार आवाज़ ने जल्दी उठने पर मजबूर कर दिया था |किवाड़ खोलते ही पुलिस एक भद्दी सी गाली देते हुए अन्दर घुस आई | और पूरे घर की तलाशी शुरू कर दी सारा सामान इधर उधर फेंकते हुए पुलिस साले कटुवे... तेरी माँ की... मादर... जैसी गलियां भी बक रहे थे|क़यामत का मंज़र था...सारा मोहल्ला घर के सामने एक भीड़ की शक्ल में जमा हो गया था |ठिठुरती ठण्ड में कांपते हुए गरीब बच्चे की तरह कांप रहा था उनका पूरा बदन| ये सुनकर की उनका बेटा जावेद अली अलकायदा का आतंकी है और पुलिस ने उसे एक मुठभेड़ में पकड़ लिया है |कोहराम मच गया था उनके घर में..|
सुबह की रौशनी फैलते ही टीवी चैनल वाले चीख चीख कर कह रहे थे |
जावेद नाम का आतंकवादी गिरफ्तार |अलकायदा का एरिया कमांडर है जावेद |किसी बड़े बम धमाके की फ़िराक में था ये |मुठभेड़ के बाद लगी सुरछ्छा एजेंसी के हाथो बड़ी सफलता|
जैसे जैसे सूरज आग उगल रहा था वैसे वैसे पत्रकारों के सावल भी हारुन अली को जला रहे थे |सत्तर के साल के बूढ़े हारुन अली ने कभी ख्वाब में नहीं सोचा था की ये दिन भी उनकी ज़िन्दगी में आएगा |सवालों से बौखला कर हाथ जोड़ कर बोले क्यों एक बूढ़े की जान लेने पर तुले हुए हैं आप लोग |रोते हुए बोले या अल्लाह ये क्या हो गया |किस गुनाह की सजा दी है तूने | पूरे शर में एक कुहराम मचा हुआ था ये खबर सुनकर |
अभी परसों ही घर आया था जावेद |छोटी बहन की शादी की तैयारी जो करनी थी उसे |कितना मिलनसार लड़का था वो |पिछले साल ही तो इंजीनियरिंग पास की थी उसने |नहीं नहीं जावेद और आतंकवादी कत्तई नहीं |हर इन्सान की जुबां पर यही बात थी |कोई ये मानने को तैयार ही नहीं था की जावेद आतंकवादी है|पूरे शहर में कुहराम मचा था |हारुन अली के घर पूछिए मत कब्रिस्तान जैसी मुर्दनी छाई हुई थी |न खाने का होश न पीने का |लेकिन कुछ करना तो था ही यु ही हाथ पे हाथ रख के बैठा तो जा नहीं सकता था |हारुन साहब की ढलती उम्र और कमजोरी |उस पर बेटा दहशत गर्द के आरोप में क़ैद|कमर टूट गई थी उनकी |बात काबिले यकीन तो न थी मगर शक के घेरे में तो आ ही गया था उनका घर |रिश्तेदारों ने नाता तोड़ लिया था उनसे |दोस्त भी मुह चुराने लगे थे |क़यामत के दिन थे ये |लेकिन असली क़यामत तो उस दिन टूटो थी जिस बेटी का रिश्ता ये कहकर तोड़ दिया गया की हम एक आतंकवादी के घर शादी नहीं कर सकते |
लगातार दो माह की भाग दौड़ के बाद आज जावेद से मिलने से मिलने का मौक़ा मिल पाया था |पहले तो पहचान ही न पाए थे जावेद को हारून साहब |सुर्ख आँखे लगातार कई रात को जागने की चुगली कर रही थीं |
बदन हड्डियों का ढांचा, चेहरा बेवा की सफ़ेद चादर सा बेरंग |दोनों हाथो में पट्टियां और पैरो पर चढ़े प्लास्टर ने चलने लायक भी न छोड़ा था उसे |व्हीलचेयर पर बैठे २२ साल के जावेद ने अगर अब्बू कहकर न पुकारा होता तो हारुन अली उसे पहचान ही न पाते |बाप बेटे के मिलन का वो मंज़र बस इतना समझ लीजिये ...आंसुओं की तूफानी बारिश थी जो उम्मीद की मुंडेरों को गला देना चाहती थीं |
हारुन अली के साथ भी वही हुआ |जो आम हिन्दुस्तानी के साथ इस देश की हुकूमत और अदालते करती हैं |मुक़दमे चले,पेशियाँ हुईं,तारीखों पर तारीखें मिलती रहीं|वक़्त गुज़रता रहा |इस दौरान क्या कुछ नहीं हुआ हारुन अली की ज़िन्दगी में |ज़मीनें बिकी,मकाम नीलाम हुआ |सारा असबाब मुक़दमे बाज़ी निगल गई |फिर भी एक उम्मीद....|लेकिन एक दिन वो हुआ जिस की उम्मीद किसी ने भी नहीं की थी खुद हारुन अली ने भी नहीं|
बेटे की बेगुनाही का मुक़दमा लड़ते लड़ते खुद अपनी ज़िन्दगी की बाज़ी हार गए हारुन अली |
बाप की मय्यत को कन्धा भी न दे सका जावेद |आखिरी दीदार भी न कर सका उनका | जेल के अँधेरे में दफन हो गई उसकी जवानी |पूरे दस साल क़ैद रहा वो सिर्फ शक की बिना पर |
जावेद अली खान वल्द हारुन अली खान पर लगाए सारे आरोप बेबुनियाद और झूठे हैं लिहाज़ा अदालत जावेद अली को रिहा करती है और जाँच एजेंसियों को ताकीद करती है की भविष्य में ऐसी गलती दुबारा न हो |पूरे शहर में जश्न का mahaol था |मिठाइयाँ बाँट रही कुरैशी टोला में |पूरे शहर को था जावेद का इन्तिज़ार |
आखिर दोपहर तीन बजे घर पहुंचा जावेद ||गले मिलकर मुबारकबाद दे रहे थे लोग उसे|बहुत खुश थे लोग उसे देखकर |मगर जावेद एक जिंदा लाश की मानिंद था |उसका चेहरा किसी बेवा की उजड़ी मांग की तरह बेनूर था |कुछ नहीं था उसके सपाट चेहरे में \अगर कुछ था तो कुछ सवाल जिनका जवाब मिलना नामुमकिन था |
कौन ज़िम्मेदार है मेरी तबाही का ???
मेरे ऊपर हुए ज़ुल्मों का कौन ज़िम्मेदार है???
मेरा घर बर्बाद हो गया कौन ज़िम्मेदार ???
मेरा बाप मेरी रिहाई की उम्मीद लिए हुए मर गया कौन ज़िम्मेदार???
मेरी बहन का रिश्ता टूट गया कौन ज़िम्मेदार ???
मेरे अज़ीयत में गुज़ारे हुए दस सालो का हिसाब कौन देगा???
मेरा भविष्य तबाह हो गया कौन ज़िम्मेदार???
मेरे माथे पे लगे बदनामी के कलंक का कौन ज़िम्मेदार???
सिर्फ शक की बिना पर|क्योंकि मै मुसलमान हूँ |और हर मुसलमान दहशत गर्द होता है |आखिर कब तक होता रहेगा ये |आखिर कब तक |
sachchai to yahi hai..
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