Saturday, 31 December 2011

PAKEEZA MUHABBAT KI NISHANI TAJMAHAL

वो आलिशान और तारीखी इमारत जिसे देखकर हर इन्सान के ज़हन में बस यही ख्याल आता है |ये है एक बादशाह की मुहब्बत की निशानी जो उसने अपनी महबूब बीवी के लिए बनवाई थी |
मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने बनवाई थी ये खुबसूरत इमारत |जिसे आज हम जानते हैं ताजमहल के नाम से|ताजमहल अपनी बेलौस खूबसूरती अपने नाम के ज़रिये ज़ाहिर करता है |पर्सियन ज़बान से लिया गया लफ्ज़ है ताज महल जिसके माने होता है "इमारतो का ताज" |ताजमहल भारत में मुस्लिम कला की महानता का मुकम्मल नमूना है |1983 का वो अज़ीम दिन जब ताजमहल पहली बार विश्व धरोहरों की लिस्ट शामिल हुआ था |तबसे आज तक इसकी जगह अव्वल ही है |
                           शाहजहाँ की बीवी मुमताज महल जिसे वो अपनी जान की तरह प्यार करता था जब अपनी  चौदहवी  औलाद गौहरा बेगम की पैदाइश के वक्त मर गई तो शाहजहाँ बुरी तरह टूट गया था |कहते हैं मुमताज़ की मौत का दुःख शाहजहाँ पर इतना गहरा था की ताजिंदगी उसके होठों पर मुस्कराहट नहीं आई थी |
                 शाहजहाँ ने अपनी इस मुहब्बत को अमर बनाने के लिए एक ऐसी इमारत बनाने का फैसला किया जो आने वाली नस्लों के लिए एक पाक मुहब्बत की मिसाल बन गई |23 अक्टूबर 1632 को इस अज़ीम ईमारत की नीव रक्खी गई |जमुना नदी के किनारे की ये ज़मीन जो काफी गहरे में थी इसलिए बराबर करने में ही लगभग 6 से 8 महीने का वक़्त लग गया |
ताजमहल जो हर हिन्दुस्तानी के लिए एक गर्व का विषय है |इसकी भव्यता और खूबसूरती की दूसरी मिसाल मिलना नामुमकिन है |इसे बनाने में न जाने कितना वक़्त लगा न जाने कितने मजदूरों ने काम किया और न जाने कितना पैसा लगा|
                                             हजारों साल रोती है नर्गिस अपनी बेनूरी पर
                                             बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा
फिर भी एक अंदाज़े के मुताबिक ताजमहल को बनाने में लगभग २०,००० मजदूरों ने दिन रात काम किया,२० साल का लम्बा वक़्त लगा ओर लगत आई ३ अरब ३० करोड़ रूपए | पूरी दुनिया के सबसे काबिल इंजीनियरों ने बनाया था इसे |सारी दुनिया से इसमें लगने वाला सामान मंगाया गया था |
ताज महल अपने अन्दर आने वाले हर इंसान का इन खुबसूरत लफ़्ज़ों में स्वागत करता है "ऐ रूह तुझ पर अल्लाह की रहमत बरसे ओर तु खुदा की बारगाह में आराम कर|ताजमहल की दीवारें जिन पर कुरान की 15सूरह
(छंद ) को इस पाकीजगी से उकेरा गया है जिसकी मिसाल मिलना लगभग नामुमकिन है |
मुमताज़ महल जिसकी कब्र तहखाने में है उस पर अल्लाह के 99 नाम लिखें हैं ओर साथ में ये भी लिखा है की "उसने रजब 1076 हिजरी में इस दुनिया से विदा ली" 
तमाम दुनिया की मशहूर ओर मारूफ कारीगरों की रूहें भी जब अपनी इस नक्स्निगरी को देखती होंगी तो उन्हें अपनी कला पे फख्र सा होता होगा |
अपने दमन में खूबसूरती के साथ काफी मनघडंत कहानियां भी समेटे हुए है ताज महल |जिनमें एक जो सबसे मशहूर है वो है की बादशाह ने ताज महल बनाने वालों के हाथ कटवा लिए थे ताकि इस जैसी दूसरी कोई इमारत न बन सके गलत ओर बेबुनियाद है |
जीन बाप्टिस्ट जो 1663 में आगरा आया था उसने लिखा है हाथ कटवाने की बात गलत है |हाँ बादशाह ने उन लोगों से इस बात के दस्तखत ज़रूर करवा लिए थे की इस जैसी कोई और इमारत नहीं बनाई जाएगी |ताजमहल जो अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर है उससे कहीं ज्यादा वो मशहूर है एक सच्ची और पाक मुहब्बत की निशानी के लिए जो एक बादशाह का अपनी महबूब बीवी के लिए अनमोल तोहफा है |
अपनी आलिशान मीनारों, बेमिसाल नक्काशी ,खुबसूरत गुम्बद और मेहराब के साथ जमुना नदी किनारे खड़ी ये सफ़ेद संगमरमरी इमारत पिछले कई दशको से अपनी शान और भव्यता में लाजवाब है |       

DAHSHAT GARD

सूरज की पहली किरण जो कुह लोगो के लिए लाती है| ख़ुशी का पैगाम तो कुछ के लिए दर्द और परेशानी |यही कुदरत का दस्तूर है |पूर्वी उत्तर परदेस का एक शहर नवाब्गढ़  |यही एक मोहल्ला है कुरैशी टोला |यहाँ रहने वाले हारुन अली के लिए अप्रैल की वो सुबह एक मनहूस खबर ले कर आई थी |
     दरवाज़े पर होने वाली ज़ोरदार आवाज़  ने जल्दी उठने पर मजबूर कर दिया था |किवाड़ खोलते ही पुलिस  एक भद्दी सी गाली देते हुए अन्दर घुस आई | और पूरे घर की तलाशी शुरू कर दी  सारा सामान इधर उधर फेंकते हुए पुलिस साले कटुवे... तेरी माँ की... मादर... जैसी गलियां भी बक रहे थे|क़यामत का मंज़र था...सारा मोहल्ला घर के सामने एक भीड़ की शक्ल में जमा हो गया था |ठिठुरती ठण्ड में कांपते हुए गरीब बच्चे की तरह कांप रहा था उनका पूरा बदन| ये सुनकर की उनका बेटा जावेद अली अलकायदा का आतंकी है और पुलिस ने उसे एक मुठभेड़ में पकड़ लिया है |कोहराम मच गया था उनके घर में..|
सुबह की रौशनी फैलते ही टीवी चैनल वाले चीख चीख कर कह रहे थे |
                     जावेद नाम का आतंकवादी गिरफ्तार |अलकायदा का एरिया कमांडर है जावेद |किसी बड़े बम                               धमाके की फ़िराक में था ये |मुठभेड़ के बाद लगी सुरछ्छा एजेंसी के हाथो बड़ी सफलता|
            जैसे जैसे सूरज आग उगल रहा था वैसे वैसे पत्रकारों के सावल भी हारुन अली को जला रहे थे |सत्तर के साल के बूढ़े हारुन अली ने कभी ख्वाब में नहीं सोचा था की ये दिन भी उनकी ज़िन्दगी में आएगा |सवालों से बौखला कर हाथ जोड़ कर बोले क्यों एक बूढ़े की जान लेने पर तुले हुए हैं आप लोग |रोते हुए बोले या अल्लाह ये क्या हो गया |किस गुनाह की सजा दी है तूने | पूरे शर में एक कुहराम मचा हुआ था ये खबर सुनकर |
    अभी परसों ही घर आया था जावेद |छोटी बहन की शादी की तैयारी जो करनी थी  उसे |कितना मिलनसार लड़का था वो |पिछले साल ही तो इंजीनियरिंग पास की थी उसने |नहीं नहीं जावेद और आतंकवादी कत्तई नहीं |हर इन्सान की जुबां पर यही बात थी |कोई ये मानने को तैयार ही नहीं था की जावेद आतंकवादी है|पूरे शहर में कुहराम मचा था |हारुन अली के घर पूछिए मत कब्रिस्तान जैसी मुर्दनी छाई हुई थी |न खाने का होश न पीने का |लेकिन कुछ करना तो था ही यु ही हाथ पे हाथ रख के  बैठा तो जा नहीं सकता था |हारुन साहब की ढलती उम्र और कमजोरी |उस पर बेटा दहशत गर्द के आरोप में क़ैद|कमर टूट गई थी उनकी |बात काबिले यकीन तो न थी मगर शक के घेरे में तो आ ही गया था उनका घर |रिश्तेदारों ने नाता तोड़ लिया था उनसे |दोस्त भी मुह चुराने लगे थे |क़यामत के दिन थे ये |लेकिन असली क़यामत तो उस दिन टूटो थी जिस बेटी का रिश्ता ये कहकर तोड़ दिया गया की हम एक आतंकवादी  के घर शादी नहीं कर सकते |
      लगातार दो माह की भाग दौड़ के बाद आज जावेद से मिलने से मिलने का मौक़ा मिल पाया था |पहले तो पहचान ही न पाए थे जावेद को हारून साहब |सुर्ख आँखे लगातार कई रात को जागने की चुगली कर रही थीं |
बदन हड्डियों का ढांचा, चेहरा बेवा की सफ़ेद चादर सा बेरंग |दोनों हाथो में पट्टियां और पैरो पर चढ़े प्लास्टर ने चलने लायक भी न छोड़ा था उसे |व्हीलचेयर पर बैठे २२ साल के जावेद ने अगर अब्बू कहकर न पुकारा होता तो हारुन अली उसे पहचान ही न पाते |बाप बेटे के मिलन का वो मंज़र बस इतना समझ लीजिये ...आंसुओं की तूफानी बारिश थी  जो उम्मीद की मुंडेरों को गला देना चाहती थीं |
      हारुन अली के साथ भी वही हुआ |जो आम हिन्दुस्तानी के साथ इस देश की हुकूमत और अदालते करती हैं |मुक़दमे चले,पेशियाँ हुईं,तारीखों पर तारीखें मिलती रहीं|वक़्त गुज़रता रहा |इस दौरान क्या कुछ नहीं हुआ हारुन अली की ज़िन्दगी में |ज़मीनें बिकी,मकाम नीलाम हुआ |सारा असबाब  मुक़दमे बाज़ी निगल  गई |फिर भी एक उम्मीद....|लेकिन एक दिन वो हुआ जिस की उम्मीद किसी ने भी नहीं की थी खुद हारुन अली ने भी नहीं|
बेटे की बेगुनाही का मुक़दमा लड़ते लड़ते खुद अपनी ज़िन्दगी की बाज़ी हार गए हारुन अली |
बाप की मय्यत को कन्धा भी न दे सका जावेद |आखिरी दीदार भी न कर सका उनका | जेल के अँधेरे में दफन हो गई उसकी जवानी |पूरे दस साल क़ैद रहा वो सिर्फ शक की बिना पर |
                             जावेद अली खान वल्द हारुन अली खान पर लगाए सारे आरोप बेबुनियाद और झूठे हैं लिहाज़ा अदालत जावेद अली को रिहा करती है और जाँच एजेंसियों को ताकीद करती है की भविष्य में ऐसी गलती दुबारा न हो |पूरे शहर में जश्न का mahaol था |मिठाइयाँ बाँट रही कुरैशी टोला में |पूरे शहर को था जावेद का इन्तिज़ार |
आखिर दोपहर तीन बजे घर पहुंचा जावेद ||गले मिलकर मुबारकबाद दे रहे थे लोग उसे|बहुत खुश थे लोग उसे देखकर |मगर जावेद एक जिंदा लाश की मानिंद था |उसका चेहरा किसी बेवा की उजड़ी मांग की तरह बेनूर था |कुछ नहीं था उसके सपाट चेहरे में \अगर कुछ था तो कुछ सवाल जिनका जवाब मिलना नामुमकिन था |
        कौन ज़िम्मेदार है मेरी तबाही का ???
        मेरे ऊपर हुए ज़ुल्मों का कौन ज़िम्मेदार है???
        मेरा घर बर्बाद हो गया कौन ज़िम्मेदार ???
        मेरा बाप मेरी रिहाई की उम्मीद लिए हुए मर गया कौन ज़िम्मेदार???
        मेरी बहन का रिश्ता टूट गया कौन ज़िम्मेदार ???
        मेरे अज़ीयत में गुज़ारे हुए दस सालो का हिसाब कौन देगा???
        मेरा भविष्य तबाह हो गया कौन ज़िम्मेदार???
        मेरे माथे पे लगे बदनामी के कलंक का कौन ज़िम्मेदार???
  सिर्फ शक की बिना पर|क्योंकि मै मुसलमान हूँ |और हर मुसलमान दहशत गर्द होता है |आखिर कब तक होता रहेगा ये |आखिर कब तक |

           

DAHSHAT GARD


Tuesday, 27 December 2011

arzoo

                       

jab meri rooh is jism azad ho.
fiza afsurda aur sama nashad ho.
 
maleke- haqiqi se ye rooh jo mil jaye.
ye badan mitti ka jo mitti me mil jaye.
 
gam duniya ka aur na khauf-ruswai ka ho
 mujhse ek sawal bas meri parsai  ka    ho

meri akhri tamanna ko ai jahan walo.
bas itna kar dena mere khandan walo  

meri maut jab meri maa pareshan ho jaye.
har khusio masarrat uspe haram ho jaye

jaise ugta hai suraj sholao aatish bankar.
ashk ankho bahen uski barish bankar.        

itna karna jab meri maa ko dilasa dena.
kisi aur maa ki ujdi hui godi dikha dena.

gusl dena meri laash ko, fatiha karna.
na ho sake ye bhi to azan hi kahna.

meri magfirat ko tum ye jatan karna.
mere janaze pe surate quran ki kahna.

ba wazu karna mujhe,ba kafan karna.
mere lashe ko mere apne me hi dafan karna